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बेचैन विक्रम, विराज की जलन

मीटिंग रूम में एसी की ठंडी हवा चल रही थी,

लेकिन पंछी को लग रहा था

जैसे कुछ बार-बार उसके चेहरे से टकरा रहा हो।

उसके खुले बाल।

हर बार जब वह नोटबुक में झुकती,

या स्क्रीन की तरफ़ देखती,

कोई-न-कोई लट

उसकी आँखों के सामने आ जाती।

पहली बार उसने हल्के से

उँगलियों से बाल पीछे किए।

पढ़ाई में वापस लग गई।

कुछ सेकंड।

फिर वही।

अब इस बार

थोड़ा ज़्यादा झुंझलाहट के साथ

उसने बालों को कान के पीछे खिसकाया।

लेकिन बाल मानो सुनने को तैयार ही नहीं थे।

वे फिर फिसल आए।

पंछी ने सांस छोड़ी।

हल्की, मगर चिढ़ी हुई।

दीपक सामने बैठा यह सब देख रहा था।

वह समझ गया था—

यह distraction अब पंछी को सच में परेशान कर रहा है।

पंछी ने कोशिश की

कि बातों पर फोकस बनाए रखे।

“तो अगर हम इस पॉइंट को यहाँ शिफ्ट करें—”

वह बोलते-बोलते रुकी।

क्योंकि उसी पल

एक और लट उसकी पलकों को छू गई।

इस बार वह रुक गई।

सीधे खड़ी हुई।

बालों को एक बार फिर पीछे किया।

लेकिन इस बार

उसके चेहरे पर साफ़ irritation था।

वह प्रोफेशनल थी,

लेकिन इंसान भी थी।

और यह छोटी-सी चीज़

अब उसकी एकाग्रता तोड़ रही थी।

दीपक ने यह नोटिस किया।

उसने कुछ कहा नहीं।

बस कुर्सी से थोड़ा आगे झुका।

बहुत नॉर्मल मूवमेंट।

बिल्कुल स्वाभाविक।

उसने अपनी उँगलियाँ उठाईं

और बिना पंछी के चेहरे को छुए

धीरे-से

उसके सामने गिरते बालों को समेट लिया।

एक सेकंड का काम।

पंछी पल भर के लिए चौंकी।

उसने दीपक की तरफ़ देखा।

दीपक की आँखों में

कोई एक्सप्रेशन नहीं था।

ना स्माइल।

ना कुछ और।

बस एक साधारण-सा प्रोफेशनल जेस्चर।

“ऐसे ठीक रहेगा,”

उसने शांति से कहा।

फिर उसने

अपनी दूसरी जेब से

एक पतली-सी हेयर टाई निकाली।

पंछी कुछ बोल पाती,

उससे पहले ही

दीपक ने उसके बालों को

पीछे की तरफ़ समेट लिया।

सारे बाल।

एक साफ़, सिंपल पोनीटेल।

इतना कसा हुआ

कि अब कोई लट

आगे आने की गुंजाइश ही नहीं थी।

पंछी ने राहत की सांस ली।

“थैंक यू,”

उसने बिना ज़्यादा सोचे कहा।

दीपक बस सिर हिलाकर

पीछे अपनी जगह बैठ गया।

मीटिंग

फिर से अपने ट्रैक पर आ गई।

व्हाइटबोर्ड।

नोट्स।

डिस्कशन।

सब कुछ नॉर्मल।

लेकिन—

केबिन के उस पार

कुछ भी नॉर्मल नहीं था।

विराज ने यह सब देखा था।

हर एक सेकंड।

पहले—

पंछी का परेशान होना।

फिर—

दीपक का आगे झुकना।

फिर—

उसका हाथ उठना।

और फिर—

उसके बालों को

अपनी उँगलियों में समेटना।

विराज की सांस

एक पल के लिए

रुक-सी गई।

उसकी आँखें

स्क्रीन पर जमी हुई थीं।

अब वह

डिस्टेंस नहीं देख रहा था।

अब वह

कनेक्शन देख रहा था।

और वह कनेक्शन

उसे बर्दाश्त नहीं था।

उसकी उँगलियाँ

पूरी तरह मुट्ठी में बदल चुकी थीं।

नाख़ून

हथेली में गड़ चुके थे।

जब दीपक ने

हेयर टाई निकाली—

विराज की जबड़े की मांसपेशियाँ

ज़ोर से कसीं।

उसका चेहरा

पत्थर की तरह सख़्त हो गया।

आँखों में

वह आग थी

जो बाहर आने को

तैयार खड़ी थी।

“हद…”

उसके होंठों से

बहुत धीमी आवाज़ निकली।

इतनी धीमी

कि केबिन की दीवारें भी

शायद न सुन पाईं।

लेकिन उसके अंदर

कुछ टूट चुका था।

यह अब

अननेसेसरी रिएक्शन नहीं था।

यह अब

सिर्फ़ जलन नहीं थी।

यह कंट्रोल से बाहर जाता हुआ

गुस्सा था।

पंछी ने

थैंक यू कहा था।

विराज ने

वह भी देखा।

उसका सिर

हल्का-सा झुका था।

आवाज़ में

सच्ची राहत थी।

और वही—

विराज के सब्र की

आख़िरी दीवार थी।

उसने बिना सोचे

अपना हाथ बढ़ाया।

डेस्कटॉप के किनारे।

एक झटके में—

स्क्रीन ब्लैक हो गई।

केबिन में

एक तेज़, भारी सन्नाटा भर गया।

विराज ने

डेस्कटॉप बंद कर दिया था।

यहीं तक।

अगले नरेशन के लिए मैं यहीं रुक रही हूँ।

मगर अब जो हुआ था

वह ज्वालामुखी के विस्फोट के लिए काफ़ी था।

मीटिंग रूम में a c की ठंडी हवा चल रही थी,

जिससे उसके खुले बाल बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे।

हर बार जब वह नोटबुक में झुकती,

या स्क्रीन की तरफ़ देखती,

कोई-न-कोई लट

उसकी आँखों के सामने आ जाती।

पहली बार उसने हल्के से उँगलियों से बाल पीछे किए।

पढ़ाई में वापस लग गई।

कुछ सेकंड।

फिर वही। अब इस बार थोड़े झुंझलाहट के साथ

उसने बालों को कान के पीछे खिसकाया।

लेकिन बाल मानो सुनने को तैयार ही नहीं थे।

वे फिर फिसल आए।

पंछी ने सांस छोड़ी।

हल्की, मगर चिढ़ी हुई।

दीपक सामने बैठा यह सब देख रहा था।

वह समझ गया था—

यह distraction अब पंछी को सच में परेशान कर रहा है।

पंछी ने कोशिश की

कि बातों पर फोकस बनाए रखे।

“तो अगर हम इस पॉइंट को यहाँ शिफ्ट करें—”

वह बोलते-बोलते रुकी।

क्योंकि उसी पल

एक और लट उसकी पलकों को छू गई।

इस बार वह रुक गई।

झुंझलाहट में उसने एक झटके के साथ अपने बालों को पीछे धकेला।

और यह छोटी सी चीज उसके focus को खराब कर रही थी।

दीपक ने यह नोटिस किया।

उसने कुछ कहा नहीं।

बस कुर्सी से थोड़ा आगे झुका।

उसने अपनी उँगलियाँ उठाईं

और बिना पंछी के चेहरे को छुए

धीरे-से

उसके सामने गिरते बालों को समेट लिया।

एक सेकंड का काम।

पंछी पल भर के लिए चौंकी।

उसने दीपक की तरफ़ देखा।

दीपक की आँखों में

कोई एक्सप्रेशन नहीं था।

ना स्माइल।

ना कुछ और।

बस एक साधारण-सा प्रोफेशनल जेस्चर।

“ऐसे ठीक रहेगा,”

उसने शांति से कहा।

फिर उसने

अपनी दूसरी जेब से

अपना रुमाल निकाला।

पंछी कुछ बोल पाती,

उससे पहले ही

दीपक ने उसके बालों को पीछे की तरफ़ समेट लिया।

सारे बाल।

एक साफ़, सिंपल पोनीटेल।

इतना कसा हुआ

कि अब कोई लट

आगे आने की गुंजाइश ही नहीं थी।

पंछी ने राहत की सांस ली।

“थैंक यू,”

उसने बिना ज़्यादा सोचे कहा।

दीपक बस सिर हिला कर पीछे अपनी जगह बैठ गया।

इसके बाद वह दोनों फिर से पढ़ाई पर ध्यान देने लगे।

मीटिंग रूम में अब पन्ने पलटने और पेन चलने की आवाज ही आ रही थी

सब कुछ नॉर्मल।

लेकिन—

केबिन के उस पार

कुछ भी नॉर्मल नहीं था।

विराज ने यह सब देखा था।

हर एक सेकंड।

पहले—पंछी का परेशान होना।

फिर—दीपक का आगे झुकना।

फिर—उसका हाथ उठना।

और फिर—

उसके बालों को अपनी उँगलियों में समेटना।

विराज की नसे तन गई।

उसकी आँखें स्क्रीन पर जमी हुई थीं।

अब वह

डिस्टेंस नहीं देख रहा था।

दीपक और पंछी की नजदीकियां विराज को रास नहीं आ रही थी,

जबकि वह दोनों नजदीक थे भी नहीं।

उसकी उँगलियाँ पूरी तरह मुट्ठी में बदल चुकी थीं।

केबिन में इस वक्त विराज के नकल के चटकने की साफ-साफ आवाज सुनाई दे रही थी।

दीपक ने जब पॉकेट से रुमाल निकाला—

विराज की जबड़े की मांसपेशियाँ

ज़ोर से कसीं।

उसका चेहरा

पत्थर की तरह सख़्त हो गया।

आँखों में वह आग थी जो बाहर आने को तैयार खड़ी थी।

“बस…”

उसके होंठों से बहुत धीमी आवाज़ निकली।

इतनी धीमी कि केबिन की दीवारें भी शायद न सुन पाईं।

लेकिन उसके अंदर

कुछ टूट चुका था।

यह अब

अननेसेसरी रिएक्शन नहीं था।

यह अब

सिर्फ़ जलन नहीं थी।

यह कंट्रोल से बाहर जाता हुआ

गुस्सा था।

पंछी ने थैंक यू कहा था।

विराज ने वह भी देखा।

उसका सिर हल्का-सा झुका था।

उसके चेहरे पर यह साफ दिख रहा था कि वह यह दिल से कह रही थी।

और वही—

विराज के सब्र की आख़िरी दीवार थी।

उसने बिना सोचे अपना हाथ बढ़ाया।

डेस्कटॉप के किनारे।

एक झटके में—स्क्रीन ब्लैक हो गई।

केबिन में एक तेज़, भारी सन्नाटा भर गया।

विराज ने डेस्कटॉप बंद कर दिया था।

जब तक दीपक पंछी के आसपास था,

विराज उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।

यह बात

विराज बहुत अच्छे से जानता था।

और यही वजह थी

कि वह अपने केबिन में

बिना हिले-डुले बैठा हुआ था।

कुर्सी की पीठ से लगा हुआ।

दोनों पैर ज़मीन पर टिके हुए।

हाथ आर्म्रेस्ट पर कसे हुए थे

एक सेकंड

दो सेकंड

और क्रैक

अब विराज के हाथों में कुर्सी का टूटा हुआ हैंडल था क्योंकि उसका सारा गुस्सा उसे हैंडल पर ही निकला।

और यह गुस्सा अब पंछी की क्लास खत्म होने के बाद दीपक के ऊपर उतारने वाला था।

डेस्कटॉप अब बंद था।

कमरे में कोई स्क्रीन जल नहीं रही थी।

केबिन में

सिर्फ़ दीवार पर लगी घड़ी की आवाज़ थी।

टिक—

टिक—

विराज ने अपने सामने मौजूद फाइल्स को किसका दिया और सिर्फ एक तक घड़ी को घूरने लगा।

वह इंतजार कर रहा था पंछी की क्लास खत्म होने का,

क्योंकि क्लास खत्म होने के बाद तो पंछी उसके पास ही आने वाली थी

और दीपक उसके आदमियों के हाथ में जाने वाला था।

दूसरी तरफ

ऑफिस का माहौल

सुबह के वक्त जैसा ही था।

लोग आ-जा रहे थे।

रिसेप्शन पर हलचल थी।

कहीं कॉफी मशीन चल रही थी,

तो कहीं फाइलें टेबल पर रखी जा रही थीं।

इसी बीच

विक्रम ऑफिस के अंदर आया।

उसकी चाल में

कोई हड़बड़ी नहीं थी,

लेकिन नज़रें

किसी को ढूँढ रही थीं।

वह सीधे अपनी जगह नहीं गया।

उसने इधर-उधर देखा मगर उसकी नजर सेक्रेटरी केवल की तरफ जाकर ठहर गई जो कि बाहर से बंद था।

यह वह नहीं थी।

विक्रम को

एक ही बात पता थी—

जिसकी तलाश है वह उसके दोस्त विराज की सेक्रेटरी है।

बस।

नाम नहीं पता था।

उसके ऑफिस में होने ना होने का भी विक्रम को कोई पता नहीं था।

वह एक स्टाफ मेंबर के पास रुका।

“मिस्टर सिंघानिया कि सेक्रेटरी कहां है…”

विक्रम ने बात अधूरी छोड़ी,

जैसे खुद ही सही शब्द ढूँढ रहा हो।

सामने वाला समझ गया।

“सर, आज नहीं आई हैं,”

उसने सीधे कहा।

विक्रम की भौंहें हल्की-सी सिकुड़ीं।

“लीव ली है?”

उसने पूछा।

“नहीं सर,”

स्टाफ मेंबर ने सिर हिलाया,

“कोई मैसेज नहीं छोड़ा।”

विक्रम ने कुछ नहीं कहा।

बस

“ओके” कहा

और आगे बढ़ गया।

लेकिन उसकी चाल अब थोड़ी धीमी थी।

वह अपने केबिन में पहुँचा।

अपनी कुर्सी खींच कर बैठ गया

कुछ सेकंड तक

वह ऐसे ही बैठा रहा।

फिर मोबाइल उठाया।

स्क्रीन अनलॉक की।

उसने फोन में फौरन ही विराज का नंबर निकाला वह उससे पूछना चाहता था।

कुछ देर तक वह यूं ही नंबर को घूरता रहा

मगर फिर फोन स्क्रीन ऑफ करके फोन वापस टेबल पर रख दिया

विक्रम को

यह बात खटक रही थी—

विक्रम को यह बात समझते देर नहीं लगी के वह लड़की फिर से उसे भगाने की कोशिश कर रही है।

मगर इस बार और सांप था क्योंकि इस बार वह कहीं नहीं भाग सकती थी।

भागने का मतलब था उसकी जब चली जाती।

मगर हमारे विक्रम बाबू को कौन बताएं उसे क्या ही फर्क पड़ता है उसकी जॉब रहे ना रहे

वह तो पूरे सिंघानिया अंपायर की मालकिन है

चाहत ऑफिस नहीं गई थी।

घर से निकलते वक्त उसने यही कहा था—

“आज ऑफिस जा रही हूँ।”

लेकिन वह ऑफिस की तरफ़ मुड़ी ही नहीं।

बीच में ही उसने रास्ता बदल दिया

अपने दोस्तों के पास चली गई।

फोन साइलेंट पर था।

चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

उसे इस बात का

अंदाज़ा भी नहीं था

कि ऑफिस में

कोई उसके बारे में पूछ रहा है।

और वह भी उसके सुबह के कारनामे के बाद।

विक्रम बेचैन हो रहा था वह जल्द से जल्द अब चाहत से मिलना चाहता था

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