
एक हफ्ते बीत चुका था। राज की ड्यूटी शुरू हो चुकी थी—सुबह जल्दी निकलना, शाम को थका-हारा लौटना। लेकिन घर पहुँचते ही वो सब थकान गायब हो जाती थी। दरवाज़ा खुलते ही पिंकी को गोद में उठा लेता, दीवार से सटाकर होंठ चूमता, जैसे सालों से भूखा हो। पिंकी भी अब शर्म कम कर चुकी थी—वो राज के गले में हाथ डालकर जवाब देती, जाँघें उसकी कमर पर लपेट लेती।
राज की नींद अब टूटी-टूटी रहती। रात में पिंकी को बार-बार जगाकर चोदता—कभी चूत में, कभी गांड में, कभी मुँह में। पिंकी की सिसकियाँ कमरे में गूँजतीं, लेकिन राज का मन नहीं भरता था। वो सोचता—ये थोड़ी-थोड़ी देर में मिलने वाली प्यार की भूख कभी खत्म नहीं होगी।




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